किसी से अब कोई मिलने किसी के घर नहीं जाता ।
किसी से अब कोई मिलने किसी के घर नहीं जाता ।
मेरी आँखों से गुज़रे वक़्त का मंज़र नहीं जाता ।
बहुत मग़रूर था इंसान ख़ुद अपनी तरक़्क़ी पर,
क़यामत आयी यह कैसी कोई बाहर नहीं जाता ।
हवा का रुख़ जिधर भी है चराग़ों को उधर रख लो,
हो जिन में हौसला उनको कोई छू कर नहीं जाता ।
ज़माना वाक़ई बदला हुआ लगता है अब मुझ को,
यहाँ इंसान अब तो चार काँधों पर नहीं जाता ।
तिरे दरबार में होता है हर इक फ़ैसला मौला,
अदालत में तभी तो मसअला लेकर नहीं जाता ।
अगरचे तू वफ़ादारी का दम भर तो रहा है पर,
मैं कोशिश कर रहा हूँ फिर भी मेरा डर नहीं जाता ।
अगर आँखें हुकूमत की सही चश्मा लगा लेतीं,
तुम्हारी बात भी रहती हमारा सर नहीं जाता ।
- असीम आमगाँवी, आमगाँव
