सियासत में है कुछ मक्कार ज़िन्दा ।
सियासत में है कुछ मक्कार ज़िन्दा ।
इन्ही लोगों से है सरकार ज़िन्दा ।
परिंदे डर रहे है अब क़फ़स में,
कहे कैसे यहाँ है प्यार ज़िन्दा ।
भलाई के ज़माने को खरीदा,
बुराई का हुआ बाज़ार ज़िन्दा ।
कहां गायब हुई है दहशतें अब,
कही नफ़रत का है हथियार ज़िन्दा ।
कभी आंखों में था पानी सभी की,
लबों पर अब है बस तकरार ज़िन्दा ।
हज़ारो झूठ से पर्दा उठा दे,
तो हो महसूस है अख़बार ज़िन्दा ।
यह दुनिया याद रखती है उसी को,
है सच्चा जिस का भी किरदार ज़िन्दा ।
यहाँ हक़ मांगते है दौलतें भी,
है साया, मौत का हक़दार ज़िन्दा ।
- असीम आमगाँवी, आमगाँव
